Bollywood की फिल्मों में एक सीन बार-बार दोहराया जाता है — हीरो अकेला खड़ा है, हाथ में सुलगती सिगरेट और धुआं धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। बिना एक शब्द बोले ये दृश्य दर्द, मर्दानगी और एटीट्यूड — तीनों एक साथ कह देता है। आजतक के एक फीचर ने इसी सवाल को उठाया है: कभी दर्द, कभी मर्दानगी, कभी एटीट्यूड — आखिर फिल्मों में सिगरेट इतनी पावरफुल क्यों लगती है?
सच ये है कि सिगरेट Bollywood में सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि कहानी कहने का पुराना औजार है। सिनेमा की भाषा में इसे प्रॉप कहा जाता है — ऐसा सामान जो किरदार की भावना को बिना संवाद के बता दे। टूटा हुआ आशिक, दबंग अफसर, बागी नौजवान — हर किरदार के हाथ में सिगरेट का मतलब बदल जाता है, और दर्शक बिना समझाए समझ जाता है।
दर्द का चेहरा सबसे साफ दिखता है देवदास (2002) में। शाहरुख खान के चेन-स्मोकिंग देवदास ने किरदार की बर्बादी को इतना असरदार बनाया कि आज भी टूटे आशिक का जिक्र आते ही देवदास याद आता है। यहां सिगरेट नशा नहीं, किरदार के अंदर के दर्द का बाहरी निशान बन जाती है।
वहीं लंबे समय तक Bollywood में सिगरेट को मर्दानगी के शॉर्टकट की तरह भी दिखाया गया। रजनीकांत का सिगरेट उछालकर मुंह में पकड़ना 1980-90 के दशक में स्टाइल का पर्याय बन गया था। हाल में संजय गुप्ता की पोस्ट पर एक यूजर ने भी इसी सोच पर सवाल उठाया था — कि फिल्मों में सिगरेट को पुरुष किरदार को दमदार दिखाने का आसान तरीका बना दिया गया है।
तीसरा चेहरा है एटीट्यूड और बगावत का। नियम तोड़ने वाले किरदार के हाथ में सिगरेट उसकी बगावत का ऐलान होती है। कांटे (2002) में संजय दत्त का गाने के दौरान सिगरेट पीना इसी एटीट्यूड का हिस्सा था — वही दृश्य जिसकी याद हाल में संजय गुप्ता को भी दिलाई गई थी। धुएं के बीच से आती रोशनी दृश्य को गहरा बनाती है और सिगरेट का एक कश संवाद से पहले का ठहराव देता है — यही वजह है कि Bollywood के निर्देशक इसे किरदार गढ़ने के औजार की तरह इस्तेमाल करते आए हैं।
लेकिन यही औजार अब बहस के घेरे में है। 27 सितंबर 2026 को फिल्ममेकर संजय गुप्ता ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर Bollywood की तीन बड़ी फिल्मों — एनिमल, धुरंधर और लव एंड वॉर — के पोस्टर्स का एक कोलाज साझा किया, जिनमें तीनों हीरो सिगरेट के साथ दिख रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पोस्टर्स में ही हीरो को सिगरेट के साथ स्टाइलिश दिखाया जाता है, तो थिएटरों में फिल्म से पहले और बीच में चलने वाले एंटी-स्मोकिंग ऐड्स का क्या मतलब रह जाता है। कुछ यूजर्स ने उन्हें उनकी अपनी फिल्म कांटे (2002) की याद दिलाई, जिसमें संजय दत्त गाने के दौरान सिगरेट पीते नजर आते हैं — गुप्ता ने जवाब में कहा कि उस दौर में आज जैसे नो-स्मोकिंग ऐड और जागरूकता नियम मौजूद नहीं थे।
भारत में फिल्मों में धूम्रपान के दृश्यों पर सख्त नियम लागू हैं। सितंबर 2012 में स्वास्थ्य मंत्रालय के नियमों के तहत ऐसी फिल्मों की शुरुआत और बीच में कम से कम 30 सेकंड के एंटी-टोबैको हेल्थ स्पॉट और 20 सेकंड का ऑडियो-विजुअल डिस्क्लेमर दिखाना अनिवार्य कर दिया गया, और धूम्रपान के दृश्य के दौरान स्क्रीन पर स्थिर चेतावनी संदेश भी चलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, तंबाकू वाले दृश्यों वाली फिल्मों को कुल 100 सेकंड के सरकारी एंटी-टोबैको संदेश चलाने होते हैं।
टाइमलाइन: Bollywood में सिगरेट के चर्चित पल
- 1980-90 का दशक: रजनीकांत का सिगरेट उछालकर मुंह में पकड़ने वाला अंदाज स्टाइल स्टेटमेंट बना।
- 2002: देवदास — शाहरुख खान का चेन-स्मोकिंग देवदास, टूटे आशिक के दर्द का चेहरा बना।
- 2002: कांटे — संजय दत्त गाने के दौरान सिगरेट पीते नजर आए; 2026 में संजय गुप्ता की बहस में यही दृश्य याद दिलाया गया।
- 2003: COTPA कानून — तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन, प्रमोशन और स्पॉन्सरशिप पर प्रतिबंध।
- सितंबर 2012: स्वास्थ्य मंत्रालय के नियम — धूम्रपान के दृश्यों पर अनिवार्य चेतावनी, 30 सेकंड के हेल्थ स्पॉट और 20 सेकंड के डिस्क्लेमर के साथ।
- 27 सितंबर 2026: संजय गुप्ता ने X पर सिगरेट वाले फिल्म पोस्टर्स (एनिमल, धुरंधर, लव एंड वॉर) पर सवाल उठाए।
डेटा टेबल: परदे पर सिगरेट के 5 यादगार किरदार
| फिल्म (साल) | अभिनेता | सिगरेट की भूमिका |
|---|---|---|
| देवदास (2002) | शाहरुख खान | टूटे आशिक का चेन-स्मोकिंग — दर्द का प्रतीक |
| कांटे (2002) | संजय दत्त | गाने में सिगरेट — एटीट्यूड और बगावत |
| रजनीकांत की फिल्में (1980-90 का दौर) | रजनीकांत | सिगरेट उछालकर मुंह में पकड़ना — स्टाइल स्टेटमेंट |
| देव आनंद की फिल्में (1950-60 का दौर) | देव आनंद | मफलर और सिगरेट वाला अंदाज — शहरी चार्म |
| एनिमल (2023) | रणबीर कपूर | पोस्टर में सिगरेट — 2026 के पोस्टर-विवाद का केंद्र |
इसका मतलब क्या है?
इसका सीधा मतलब है कि सिगरेट Bollywood की कहानी कहने की भाषा का हिस्सा रही है — किरदार की भावना को तुरंत समझाने वाला शॉर्टकट। लेकिन असल दुनिया में इसका मतलब कुछ और है। भारत में तंबाकू से होने वाली बीमारियों को देखते हुए सरकार ने फिल्मों पर चेतावनी नियम लागू किए हैं, और खुद फिल्ममेकर भी अब इस चित्रण पर सवाल उठा रहे हैं। सिनेमा का जादू ये है कि वो एक सुलगती सिगरेट से पूरा किरदार खड़ा कर देता है — लेकिन वही जादू जब असल जिंदगी पर असर डालने लगे, तो सवाल उठना लाजमी है। ये खबर किसी भी तरह धूम्रपान का समर्थन नहीं करती; तंबाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
FAQ: सिनेमा और सिगरेट पर आपके सवाल
क्या फिल्मों में सिगरेट दिखाने पर पाबंदी है?
नहीं, पूरी पाबंदी नहीं है। लेकिन सितंबर 2012 के नियमों के तहत धूम्रपान वाले दृश्यों वाली फिल्मों को शुरुआत और बीच में 30 सेकंड के एंटी-टोबैको स्पॉट और 20 सेकंड का डिस्क्लेमर दिखाना अनिवार्य है। 2012 के नियमों की विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ें।
थिएटर में एंटी-स्मोकिंग ऐड क्यों दिखाए जाते हैं?
ये स्वास्थ्य मंत्रालय के तैयार किए गए जागरूकता संदेश हैं — ‘मुकेश’ और ‘स्पंज’ जैसे स्पॉट 2 अक्टूबर 2012 से फिल्मों के साथ दिखाए जा रहे हैं। इनका मकसद दर्शकों को तंबाकू के नुकसान के प्रति सचेत करना है।
Sanjay Gupta ने पोस्टर्स पर क्या सवाल उठाया था?
27 सितंबर 2026 को उन्होंने अपने X हैंडल पर लिखा था कि जब फिल्मों के पोस्टर्स में हीरो सिगरेट के साथ दिखते हैं, तो थिएटरों में चलने वाले एंटी-स्मोकिंग ऐड्स का क्या मतलब है। यूजर्स ने उन्हें कांटे (2002) की याद दिलाई थी। इस बहस की विस्तृत कवरेज यहां पढ़ें।
क्या सिनेमा युवाओं को धूम्रपान की ओर प्रभावित करता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की ‘स्मोक-फ्री मूवीज़’ रिपोर्ट ने नोट किया था कि तंबाकू विज्ञापन पर प्रतिबंध के बाद Bollywood फिल्मों में तंबाकू ब्रांडों का प्रदर्शन बढ़ गया था। यही वजह है कि फिल्मों में तंबाकू के चित्रण पर दुनिया भर में नियम सख्त किए गए हैं।

