बॉलीवुड अभिनेत्री Janhvi Kapoor और अभिनेता Vivek Oberoi के पर्सनैलिटी राइट्स मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम कदम उठाया है। कोर्ट ने दोनों मामलों में एमिकस क्यूरी नियुक्त किए हैं और कहा है कि इन मामलों में प्रचार अधिकार और पर्सनैलिटी राइट्स से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों पर विचार किया जाना जरूरी है। यानी अदालत अब यह तय करेगी कि पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा मांगने वाले मामलों में अदालत से कितनी व्यापक राहत मांगी जा सकती है और उसकी सीमा कहां तय होनी चाहिए।
जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने Janhvi Kapoor के मामले में वकील गौतम भाटिया और Vivek Oberoi के मामले में वकील रोहन अल्वा को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया। कोर्ट ने खास तौर पर इस सवाल पर विचार करने की बात कही कि पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा की मांग करने वाले मामलों में अदालत के समक्ष किए गए अनुरोध कितने व्यापक हो सकते हैं। कोर्ट का कहना है कि कुछ मामलों में इतने व्यापक अनुरोध मानहानि या व्यंग्य जैसे दूसरे पहलुओं को भी प्रभावित कर सकते हैं। इन मुद्दों पर अक्टूबर में सुनवाई होगी।
Janhvi Kapoor के मामले की सुनवाई के दौरान उनकी ओर से पेश वकील ने बताया कि मामले में शामिल विभिन्न कड़ियों को पिछली सुनवाई के आदेश के अनुसार तीन श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी में ऐसी सामग्री है जो पहली नजर में अश्लील और यौन रूप से आपत्तिजनक है। दूसरी श्रेणी में ऐसी सामग्री है जो सीधे तौर पर Janhvi Kapoor के पर्सनैलिटी राइट्स का व्यावसायिक इस्तेमाल करती है। तीसरी श्रेणी में ऐसी सामग्री है जिसमें उनके नाम और चेहरे का इस्तेमाल सामान और सेवाओं की बिक्री को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने के लिए किया गया है।
कोर्ट को बताया गया कि सोशल मीडिया मंचों पर Janhvi Kapoor के खिलाफ यौन रूप से आपत्तिजनक सामग्री से जुड़ी करीब 1,400 कड़ियों की पहचान की गई है और ऐसी सामग्री हटाने की मांग पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया गया। गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने Janhvi Kapoor के खिलाफ अश्लील सामग्री हटाने का निर्देश दिया था, लेकिन मामले में शामिल सभी 6,884 कड़ियों को एक साथ हटाने का व्यापक आदेश देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने सिर्फ 552 कड़ियां हटाने का निर्देश दिया था। यही वह बिंदु है जहां से “राहत कितनी व्यापक हो सकती है” वाला बड़ा कानूनी सवाल खड़ा हुआ है।
पिछले चार साल में भारत में पर्सनैलिटी राइट्स के 50 से अधिक मामले अदालतों में दर्ज हुए हैं। AI और डीपफेक तकनीक के आने के बाद किसी का चेहरा, नाम और आवाज बिना अनुमति के इस्तेमाल करना आसान हो गया है, जिससे सेलिब्रिटीज अदालतों का दरवाजा खटखटा रहे हैं। 2022 में अमिताभ बच्चन ने अपने नाम और तस्वीर के अनधिकृत इस्तेमाल पर सुरक्षा की मांग की थी, जिसके बाद अनिल कपूर और अरिजीत सिंह के मामलों ने इस कानूनी क्षेत्र को और स्पष्ट किया।
टाइमलाइन: भारत में पर्सनैलिटी राइट्स के बड़े मामले
- नवंबर 2022 — अमिताभ बच्चन: दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चन के नाम, तस्वीर और आवाज के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई और फर्जी लॉटरी घोटालों से जुड़ी वेबसाइटें ब्लॉक करने का आदेश दिया।
- मई 2023 — रारियो मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने फैंटेसी स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म के खिलाफ अंतरिम राहत देने से इनकार किया — यानी हर दावे पर रोक नहीं मिलती, सीमा तय है।
- सितंबर 2023 — अनिल कपूर: दिल्ली हाईकोर्ट ने कपूर के नाम, तस्वीर, आवाज और लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई, जिसमें AI और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल भी शामिल था।
- मई 2024 — जैकी श्रॉफ: दिल्ली हाईकोर्ट ने श्रॉफ के नाम, आवाज और तस्वीर के अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाई।
- जून 2024 — रजत शर्मा: दिल्ली हाईकोर्ट ने शर्मा के नाम, तस्वीर और लुक-अलाइक के साथ “आप की अदालत” ट्रेडमार्क के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई।
- जून 2024 — करण जौहर: बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनके नाम के अनधिकृत इस्तेमाल वाली फिल्म की रिलीज और प्रचार पर रोक लगाई।
- अगस्त 2024 — अरिजीत सिंह: बॉम्बे हाईकोर्ट ने AI से बनाई गई आवाज समेत गायक के नाम, आवाज, तस्वीर और लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई।
- जून 2025 — सद्गुरु: दिल्ली हाईकोर्ट ने सद्गुरु के नाम, आवाज, तस्वीर और लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई, जिसमें AI और डीपफेक शामिल थे।
- सितंबर 2025 — करण जौहर, ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन: दिल्ली हाईकोर्ट ने AI और डीपफेक समेत उनके नाम, तस्वीर, आवाज और लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाकर पर्सनैलिटी राइट्स की रक्षा की।
- सितंबर 2025 — नागार्जुन: दिल्ली हाईकोर्ट ने नागार्जुन के नाम, तस्वीर, आवाज और लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई।
- अक्टूबर 2025 — आशा भोसले: बॉम्बे हाईकोर्ट ने AI तकनीक से आवाज की नकल समेत गायिका के नाम, तस्वीर और आवाज के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक लगाई।
प्रमुख पर्सनैलिटी राइट्स मामले: एक नजर में
| कलाकार | साल | कोर्ट | मुख्य राहत |
|---|---|---|---|
| अमिताभ बच्चन | 2022 | दिल्ली हाईकोर्ट | नाम, तस्वीर, आवाज के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक; फर्जी लॉटरी वेबसाइटें ब्लॉक |
| अनिल कपूर | 2023 | दिल्ली हाईकोर्ट | नाम, तस्वीर, आवाज, लुक-अलाइक पर रोक; AI और डीपफेक समेत |
| जैकी श्रॉफ | 2024 | दिल्ली हाईकोर्ट | नाम, आवाज, तस्वीर के अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक |
| अरिजीत सिंह | 2024 | बॉम्बे हाईकोर्ट | AI-जनरेटेड आवाज समेत नाम, आवाज, तस्वीर के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक |
| ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन | 2025 | दिल्ली हाईकोर्ट | AI/डीपफेक समेत नाम, तस्वीर, आवाज, लुक-अलाइक के अनधिकृत इस्तेमाल पर रोक |
| Janhvi Kapoor और Vivek Oberoi | 2026 | दिल्ली हाईकोर्ट | एमिकस क्यूरी नियुक्त; राहत की सीमा पर व्यापक कानूनी सवालों पर सुनवाई लंबित |
इसका मतलब क्या है?
पर्सनैलिटी राइट्स का मतलब है — किसी व्यक्ति के नाम, चेहरे, आवाज और अंदाज का बिना इजाजत व्यावसायिक इस्तेमाल रोकने का अधिकार। भारत में इसके लिए कोई अलग कानून नहीं है; अदालतें निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाकर केस-दर-केस फैसला देती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2010 के डी.एम. एंटरटेनमेंट फैसले में व्यंग्य, पैरोडी, कला और समाचार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत संरक्षण दिया था। यही संतुलन अब कसौटी पर है — अदालत को तय करना है कि पहचान की रक्षा के नाम पर कितनी व्यापक रोक वैध है और कहां से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होने लगती है। Janhvi Kapoor के मामले में 6,884 कड़ियों में से सिर्फ 552 हटाने का आदेश इसी संतुलन का उदाहरण है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पर्सनैलिटी राइट्स क्या होते हैं?
किसी व्यक्ति के नाम, चेहरे, आवाज और विशिष्ट अंदाज का बिना अनुमति व्यावसायिक इस्तेमाल रोकने का अधिकार पर्सनैलिटी राइट्स कहलाता है।
क्या भारत में इसके लिए कोई अलग कानून है?
नहीं। भारत में पर्सनैलिटी राइट्स के लिए कोई अलग कानून नहीं है; अदालतें निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर केस-दर-केस फैसला देती हैं।
एमिकस क्यूरी क्यों नियुक्त किए गए हैं?
क्योंकि इन मामलों में व्यापक कानूनी सवाल उठे हैं — खास तौर पर यह कि राहत कितनी व्यापक हो सकती है। अदालत की मदद के लिए निष्पक्ष कानूनी राय देने हेतु वकील गौतम भाटिया और रोहन अल्वा को एमिकस क्यूरी बनाया गया है।
क्या अदालत हर ऑनलाइन कंटेंट हटाने का आदेश दे सकती है?
नहीं। Janhvi Kapoor के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी 6,884 कड़ियां हटाने की मांग ठुकरा दी थी और सिर्फ 552 कड़ियां हटाने का निर्देश दिया था — यानी हर कंटेंट को एक ही नजर से नहीं देखा जाता।
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इस खबर के प्रमुख स्रोत लाइव लॉ हिंदी और मीडियानामा की विस्तृत रिपोर्ट हैं।
