मराठी सिनेमा और लावणी की दुनिया की जानी-मानी कलाकार मधु कांबीकर का 12 अक्टूबर 2026 को पुणे में निधन हो गया। वह 73 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमारी से जूझ रही थीं। उनके निधन की खबर से मराठी फिल्म उद्योग, रंगमंच और लोककला से जुड़े कलाकारों में शोक की लहर दौड़ गई।
परिवार और करीबी लोगों के अनुसार मधु कांबीकर का अंतिम संस्कार पुणे में ही किया गया। वह अपने पीछे बेटे और बहू को छोड़ गई हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोशल मीडिया पर उनके निधन पर शोक जताया और मराठी सिनेमा, लोकनाट्य, व्यावसायिक रंगमंच तथा टेलीविजन में उनके योगदान को याद किया। ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन ने भी दिग्गज कलाकार के निधन पर दुख व्यक्त किया।
मधु कांबीकर का सफर: तमाशा के मंच से मराठी सिनेमा तक
मधु कांबीकर का जन्म 28 जुलाई 1953 को महाराष्ट्र के बीड जिले के मालेगांव में हुआ था। वह कोल्हाटी समुदाय से थीं और उनके पिता भी लोककलाकार थे। बचपन में ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पिता के साथ उनके कार्यक्रमों में जाने लगीं। बहुत छोटी उम्र में ही वह मंच पर प्रस्तुति देने लगीं। उनका मंचीय नाम ‘कांबीकर’ कांबी गांव से जुड़ा है, जहां उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की थी।
कांबीकर ने कथक और लावणी का प्रशिक्षण लिया और तमाशा मंडली के साथ प्रस्तुतियां देकर अपने करियर की शुरुआत की। लोकनाट्य और लावणी-तमाशा के मंच से उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं, जो बाद में उनकी फिल्मों और नाटकों में भी झलकती रहीं। करीब एक दर्जन लोकनाटकों और 22 से 25 समकालीन नाटकों में उन्होंने काम किया, जिनमें ‘पुत्रकामेष्टि’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘चंद्र जिथे उगवत नाही’ और ‘फुलवंती’ जैसे नाटक शामिल हैं। उन्होंने अपना खुद का नाटक ‘सखी माझी लावणी’ भी किया।
टाइमलाइन: मधु कांबीकर के जीवन की अहम तारीखें
- 28 जुलाई 1953: बीड जिले के मालेगांव में जन्म, लोककलाकार परिवार में परवरिश।
- 1977: फिल्म ‘डागा’ से बड़े पर्दे पर पहली उपस्थिति।
- 1980: ‘सौभाग्यदान’, ‘रणपाखरे’ और ‘देवापुढे माणूस’ से व्यापक पहचान, ‘ह्योच नवरा पाहिजे’ के गाने में विशेष उपस्थिति।
- 1982: ‘शापित’ में बिजली की भूमिका से बड़ी सफलता, फिल्मफेयर मराठी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और महाराष्ट्र राज्य फिल्म सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार।
- 1984: ‘हेच माझे माहेर’ के लिए महाराष्ट्र राज्य फिल्म सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार।
- 1992-1993: हिंदी फिल्म ‘शोला और शबनम’ और मराठी हिट ‘झपाटलेला’ में अहम भूमिकाएं।
- 27 नवंबर 2016: माटुंगा के यशवंत नाट्य मंदिर में लावणी-तमाशा प्रस्तुति के दौरान मंच पर बेहोश हुईं, अस्पताल में स्ट्रोक के बाद बिस्तर पर आ गईं।
- 2018: ज़ी चित्र गौरव लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मान।
- 12 अक्टूबर 2026: पुणे में 73 वर्ष की उम्र में निधन, अंतिम संस्कार पुणे में हुआ।
फिल्मोग्राफी: मधु कांबीकर की यादगार फिल्में
चार दशकों से अधिक के करियर में मधु कांबीकर ने 75 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उनकी कुछ प्रमुख फिल्में और भूमिकाएं इस प्रकार हैं:
| साल | फिल्म | भूमिका |
|---|---|---|
| 1982 | शापित | बिजली |
| 1982 | रघु मैना | मैना (मुख्य भूमिका) |
| 1984 | हेच माझे माहेर | सखु |
| 1992 | शोला और शबनम (हिंदी) | करण की मां |
| 1992 | एक होता विदूषक | मंजुला देवगांवकर |
| 1993 | झपाटलेला | पारूबाई बोलके |
| 1995 | हम दोनों | विशाल की मां |
| 1997 | यशवंत | यशवंत की मां |
इनके अलावा ‘देबू’ में उन्होंने संत गाडगे महाराज की मां की भूमिका निभाई और ‘येऊ का घरात’ में विशेष उपस्थिति दर्ज की। हिंदी सिनेमा में ‘हम दोनों’ और ‘यशवंत’ में वह नाना पाटेकर की ऑन-स्क्रीन मां के किरदार में नजर आईं।
इसका मतलब क्या है?
मधु कांबीकर उन कलाकारों में थीं जिन्होंने महाराष्ट्र की लोकपरंपरा को बड़े पर्दे तक पहुंचाया। लावणी और तमाशा जैसे लोकनाट्य रूपों से निकली एक कलाकार के रूप में उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि की महिलाओं, माताओं और सास के किरदारों को ऐसी सच्चाई दी कि वह मराठी दर्शकों के घर-घर में पहचानी जाने लगीं। एक फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार और छह महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कारों सहित उनके सम्मान इस बात के प्रमाण हैं कि लोककला से निकली प्रतिभा को मुख्यधारा सिनेमा में भी बराबर की मान्यता मिली। उनके जाने से मराठी सिनेमा की उस पीढ़ी की एक अहम कड़ी टूटी है जो मंच, लोकनाट्य और फिल्म — तीनों माध्यमों में समान रूप से सक्रिय थी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मधु कांबीकर का निधन कब और कहां हुआ?
मधु कांबीकर का निधन 12 अक्टूबर 2026 को पुणे में हुआ। वह 73 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमार थीं।
मधु कांबीकर किस कला के लिए जानी जाती थीं?
वह मराठी सिनेमा की अभिनेत्री और लावणी कलाकार के रूप में जानी जाती थीं। उन्होंने लोकनाट्य, व्यावसायिक रंगमंच, फिल्म और टेलीविजन — सभी माध्यमों में काम किया।
उनकी सबसे चर्चित फिल्में कौन सी हैं?
‘शापित’, ‘हेच माझे माहेर’, ‘रघु मैना’, ‘झपाटलेला’, ‘देबू’, ‘एक होता विदूषक’ और हिंदी फिल्म ‘शोला और शबनम’ उनकी प्रमुख फिल्मों में गिनी जाती हैं।
2016 में उनके साथ क्या हुआ था?
27 नवंबर 2016 को माटुंगा के यशवंत नाट्य मंदिर में प्रस्तुति के दौरान वह मंच पर बेहोश हो गईं। अस्पताल में उन्हें स्ट्रोक आया, जिसके बाद वह वर्षों तक बिस्तर पर रहीं और सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं।
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स्रोत और आगे पढ़ना: विकिपीडिया पर मधु कांबीकर की फिल्मोग्राफी और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट।

